दषम आचार्य श्री जगरामदास जी महाराज
आपका जन्म ग्राम इंद्राली जि. बाडमेर राजस्थान के राजपूत परिवार में भादवा सुद 4 सं. 1907 में हुआ। गृहस्थाश्रम में आपका मन कभी नहीं लगा। आपको एकान्तवास अधिक पसन्द था। फाल्गुण बुद 7 वि.संवत 1934 में आपने बालोतरा के साध श्री विनतीदासजी महाराज से दीक्षा ग्रहण की। आप अधिकतर अपना समय भजन स्मरण में ही व्यतीत करते थे। आपको एकान्त चिन्तन अधिक प्रिय था तथा प्रपंच से आप दूर रहना चाहते थे। पर कहां तक रहते? स्वर्गीय आचार्य श्री हिम्मतराम महाराज की भविष्यवाणी के अनुसार आपको संत एवं भक्तजनों द्वारा गादी पर विराजित किया। आचार्य श्री दयाराम जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर सबने मिलकर कार्तिक बुद 5 सं. 1962 को आपकी आचार्य पद पद विभूषित किया। वृद्धावस्था होते हुए भी आपने पद यात्रा करते हुए जनमानस को जाग्रत किया एवं अपने उपदेषों द्वारा उसे कल्याण का मार्ग बताया। इस प्रकार आपने भक्ति एवं राम नाम का खूब प्रचार किया। आप दयालु क्षमाषील एवं शान्ति की मूर्ति थे। अतः समाज ने आपको वषिष्ठ की उपमा से अलंकृत किया था। आपने अपने चातुर्मास 1963 में बोराणा में, 1964 में ब्यावर में, 1965 में पीपाड में किये तथा चातुर्मास 1966 में शाहपुरा में किया।
यह बडे दुर्भाग्य की बात रही कि समाज को आपका सानिध्य अधिक समय तक प्राप्त नहीं हो सका और आप चैत्र शुक्ला त्रयोदषी, शुक्रवार सं. 1967 को मध्याह्र बेला में ब्रह्मा मे समा गये। आपका शासन काल 4 वर्ष 5 महीने 24 दिन का रहा। आपके समय में रामनिवास धाम में ध्रुव खिडकी के ऊपर महल बना जिसे जगनिवास कहते हैं। भीलवाडा रामद्वारे का आगे का हिस्सा जो पहले कच्चा था वह पक्का बना, जिसे सुख सदन के नाम से भी पुकारते है। आपकी षिष्य परम्परा नहीं चली।
वशिष्ठ मुनि से श्री जग्राम दास मुनि राज।
राम भजन करवाय के, किया आपका काज।।
वीतराग स्वामी जी श्री रामजन्न जी महाराज